Wednesday, May 2, 2018

शाखा है गंगा की धारा, डुबकी नित्य लगाते हैं।

शाखा है गंगा की धारा, डुबकी नित्य लगाते हैं। 

मां का वंदन सांझ-सवेरे, श्रद्धा-सुमन चढ़ाते हैं।।

संघ-साधना अर्चन-पूजन, प्रतिदिन शीश झुकाते हैं।
भारत मां के भव्य भाल पर भगवा ध्वज लहराते हैं।।
संघस्थान मन्दिर सा पावन, मन दर्पण हो जाते हैं।
                                           शाखा है गंगा की धारा..1

इसकी रज में खेल खेल कर तन चंदन बन जाते हैं।
योग, खेल रवि नमस्कार से
स्वस्थ शरीर बनाते हैं।।
स्नेह भाव से मिलते-जुलते, मन-मत्सर मर जाते हैं।
                                          शाखा है गंगा की धारा...2

लोक संगठन के संवाहक, गटनायक बन जाते हैं।
कुम्भकार की रचना करके, गणशिक्षक कहलाते हैं।।
देशभक्ति का गीत हृदय में, मातृभक्ति पनपाते हैं।
                                         शाखा है गंगा की धारा....3

मधुकर की यह तपः साधना वज्र शक्ति बन जायेगी।
मां बैठगी सिंहासन पर, यश-वैभव को पायेगी।। 
केशव-माधव का यह दर्शन, मोह जाल कट जाते हैं।
                                          शाखा है गंगा की धारा..4

Saturday, April 28, 2018

मंत्र छोटा रीत नई आसान हमने पाई है

मंत्र छोटा रीत नई आसान हमने पाई है
छोटे छोटे संस्कारों से बात बडी बन जाती है ॥

बाते करने से क्या होता नियमित होना पडता है
नियमित शाखा जाते जाते अनुशासन फिर आता है
अनुशासन ही संस्कारों का पंथ खुला कर देता है ॥

शाखा मे हम ऐसे खेले जिससे प्रेम उमडता हो
कुछ बौद्धिक हो गीत गान हो धर्म ग्यान की चर्चा हो
भगवा ध्वज हो नित्य सामने त्याग भावना पलती है ॥

सुख दुख मे हम साथ रहें परिवार रहे हर संपर्कित
यह समाज मेरा अपना है प्रेम भावना हो अंकित
गुरु-पूजा हो श्रद्धा से विस्तार तपस्या होती है ॥

वीर सुतों के दिव्य तेज से भू पर तारांगण आए
जगत निरामय करने हेतु सेवा-व्रत हम अपनाए
इसी मंत्र से इसी तंत्र से विश्व धर्म जय होती है ॥

Thursday, February 8, 2018

चलो भाई चलो शाखा मे चलो

चलो भाई चलो शाखा मे चलो
थोडी देर अब तुम सब काम भुलो चलो
भाई चलो संग संग चलो
आज के दिन ज़रा हंसो और खेलो ॥

राम कृष्ण के वारिस हम
गर्व से कहते हिन्दु हम
भग्वा ध्वज है पुज्य परम
वन्दन उसे करो संग संग चलो ॥

जीजा का मातृत्व हमे
शौर्य लक्ष्मी का है तन मे
मौसी जी कि आन हमे
आगे बढो और संग संग चलो ॥

छोटे छोटे बच्चे हम
काम बडा करेंगे हम
धर्म की रक्षा करेंगे हम
कहेंगे वन्दे मातरम ॥

शाखा मे है REAL FUN
कबड्डि खो खो मे रम्ता मन
करो योगा भुलो गम
कदम मिलओ और संग संग चलो ॥

अनेकता में ऐक्य मंत्र को, जन-जन फिर अपनाता है।

अनेकता में ऐक्य मंत्र को,
जन-जन फिर अपनाता है।
धीरे-धीरे देश हमारा,
आगे बढता जाता है।

इस धरती को स्वर्ग बनाया,
ॠषियों ने देकर बलिदान॥
उन्हीं के वंशज आज चले फिर,
करने को इसका निर्माण।
कर्म पंथ पर आज सभी को गीता ग्यान बुलाता है॥1॥

जाति, प्रान्त और वर्ग भेद के,
भ्रम को दूर भगाना है।
भूख, बीमारी और बेकारी, इनको आज मिटाना है।
एक देश का भाव जगा दें, सबकी भारत माता है॥2॥

हमें किसी से बैर नहीं है,
हमें किसी से भीति नहीं।
सभी से मिलकर काम करेंगे,
संगठना की रीति यही।
नील गगन पर भगवा ध्वज यह, लहर लहर लहराता है॥3॥

व्यक्ती व्यक्ती मे जगाये धर्म चेतना

व्यक्ती व्यक्ती मे जगाये धर्म चेतना
जनमन संस्कार करे यही साधना ।
साधना नित्य साधना
साधना अखंड साधना ॥ध्रु॥

नित्य शाखा जान्हवी पुनीत जलधरा
साधना की पुण्यभूमी शक्ती पीठीका
रजः कणों में प्रकटें दिव्य दीप मालीका
हो तपस्वी के समान संघ साधना ॥१॥

हे प्रभो तू विश्व की अजेय शक्ती दे
जगत हो विनम्र ऐसा शील हमको दे
कष्ट से भरा हुआ ये पंथ काटने
ज्ञान दे की हो सरल हमारी साधना ॥२॥

विजयशाली संघबद्ध कार्यशक्ती दे
तीव्र और अखंड ध्येय निष्ठा हमको दे
हिंदु धर्म रक्षणार्थ वीर व्रत स्फ़ुरे
तव कृपा से हो सरल हमारी साधना ॥३॥

आज श्रध्दा सुमन अर्पित कर रहा हर्षित गगन

आज श्रध्दा सुमन अर्पित कर रहा हर्षित गगन
हे परम आराध्य केशव युग पुरूष शत शत नमन ॥धृ॥

दासताँ की शृंखला से बध्द भारत भूमी प्यारी
लुप्त चिति धृती और कृति थी सुप्त थी संस्कृति हमारी
सुप्त हिंदू राष्ट्र को जागृत किया बन रवि किरण ॥१॥
हे परम आरध्य ---

संघटन का मंत्र अभिनव संघ सुरसरी को बहाकर
कोटी युवकों के हृदय में राष्ट्र भक्ती को जगाकर
कर दिया अर्पित स्वयम् को मातृ चरणों में मगन ॥२॥
हे परम आरध्य ---

आपका वह धन्य जीवन प्रेरणा है बन गयी
कोटी युवकों के लिये साधना है बन गयी
मातृभू पर हो समर्पित एक है बस यह रटन ॥३॥
हे परम आरध्य ---

हर नगर हर ग्राम में नव चेतना का दीप जलता
हर हृदय को कर प्रकाषित संघटन का राग भरता
हो रही साकार है वह कल्पना साक्षी गगन ॥४॥
हे परम आरध्य---

अभिनंदन हे मौन तपस्वी धीरोदात्त पुजारी

अभिनंदन हे! मौन तपस्वी

अभिनंदन हे! मौन तपस्वी धीरोदात्त पुजारी!
तुम्हें जन्म दे धन्य हुई मां भारत भूमि हमारी!!

नव जीवन भर कर कण-कण में, बहा प्रेम रस धारा,
अमित राग मन में भर केशव साथर्क नाम तुम्हारा!
फिर बसंत की फूल रही है, आशा की फूलवारी………… १

आज जागरण का स्वर लेकर मलियानिल के झोंके
प्रेम हृदय में भरते जाते कोटी कोटी सुमनों के
नव प्रभात हो रहा चतुदिर्क फैली फिर उजियारा ……!! ? !!

प्राची का मुख भी उज्ज्वल है केशव किरणें फैली
चला अंधेरा ले समेट कर अपनी चादर मैली
अंधकार अज्ञान ही त्यागी मिटी कालिमा सारी …………।। २

देव तुम्हारी पुण्य स्मृति में रोम रोम हषिर्त है
देव तुम्हारे पद पदमों पर श्रध्दांजलि अपिर्त है
केशव बन ध्रुव ज्योति दिखा दो जन मानस भवहारी…… ३